दुनिया यह धर्म क्षेत्र है, कोई सैरगाह नहीं।

Bhajan

दुनिया यह धर्म क्षेत्र है, कोई सैरगाह नहीं।
जब तक है प्राण तन में, प्रभु को भुला नहीं।।

किस्मत से है मिला यह चोला मनुष्य का।
जीती हुई यह बाजी है, इसको हरा नहीं।।

बाजी बिछी है काम, क्रोध, लोभ, मोह की।
खेला अगर यह खेल, तो बस फिर फंसा नहीं।।

धन माल जिसपे इस कदर भूला हुआ है तू।
यह तो किसी के आज तक हमराह गया नहीं।।

मम मस्त हो विषयों की मय पीकर तू रात दिन।
सामान सौ  बरस का पल की खबर नहीं।।

तृष्णा  ना यह मिटेगी, ना भोग होंगे कम।
आखिर तू ही मिट जायेगा। तुझ को खबर नहीं।

करना है धर्म कर्म जो कुछ कर ले आज ही।
कल की तो कुछ खबर नहीं होगा कि या नहीं।।

God’s Promise

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४-७॥

Yadaa yadaa hi dharmasya glaanir bhavati bhaarata;
Abhyutthaanam adharmasya tadaatmaanam srijaamyaham.

Whenever there is a decline of righteousness and rise of unrighteousness, O Arjuna, then I manifest Myself! (BG 4:7).

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥४-८॥

Paritraanaaya saadhoonaam vinaashaaya cha dushkritaam;
Dharma samsthaapanaarthaaya sambhavaami yuge yuge.

I am manifested in every age for the protection of the good, the destruction of the wicked, and the establishment of righteousness. (BG 4:8)

NOTE: We all have to try to develop Krishna’s qualities in us, and then Krishna may select one of us to manifest Him fully in that person.